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ब्लाक मालखरौदा में छेर छेरा कोठी के धान हेर हेरा छत्तीसगढ़ की पारंपरिक त्योहार को धुम धाम हर्षोल्लास से मनाया गया।यह त्योहार आपसी सहयोग,दान भेट,भाईचारे और सामुदायिक भावना को भी प्रोत्साहित करता है

January 14, 2025 by Amir Raja Banjare

जिला सक्ती- (छ.ग.)

प्रदेश मिडिया प्रभारी राजा के साथ जिला रिपोर्टर अनंत कुमार चौधरी ,सुनिता कुर्रे, रुखसाना महेश ,जिला कैमरामैन रामकिशन चंद्रा, शिवा यादव,नरेश यादव,महेश सिदार।

ब्लाक मालखरौदा में छेर छेरा: छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्योहार को धुमधाम से मनाया

वरिष्ठ पत्रकार शिवा यादव अपने साथियों को लेकर छेर छेरा कोठी के धान हेर हेरा कहते हुए,धान मागे,और बच्चे भी धान मांगे।

भूमिका:
छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में लोक पर्वों का विशेष स्थान है। इन्हीं पर्वों में से एक है छेर छेरा, जो मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाता है। यह त्योहार न केवल कृषि और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करता है, बल्कि आपसी सहयोग, भाईचारे और सामुदायिक भावना को भी प्रोत्साहित करता है।

ब्लाक मालखरौदा में पत्रकार जिला सचिव शिवा यादव के साथ सभी साथियों ने मिलकर घर घर जाकर छेर छेरा कोठी के धान ला हेर हेरा कहकर धान मांगा, साथ ही 24आज तक लाइव न्यूज प्रदेश संपादक राजा बंजारे के घर सभी साथियों, बच्चे जाकर छेर छेरा मांगा, राजा बंजारे पत्रकार ने सभी को दान भेट दिया,और शुभकामनाएं दिया।—

छेर छेरा का महत्व:
छेर छेरा मुख्यतः किसानों का त्योहार है, जो फसल कटाई के बाद मनाया जाता है। इसे नव फसल उत्सव भी कहा जा सकता है। त्योहार के दौरान लोग अपनी नई फसल का कुछ हिस्सा दान करते हैं। यह दान केवल अनाज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामूहिक जीवन की अवधारणा को मजबूत करता है।

लोक मान्यता के अनुसार, छेर छेरा भगवान से जुड़ा पर्व है, जिसमें फसल उत्पादन के लिए कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।


छेर छेरा की परंपराएं:

  1. छेर छेरा गाने की परंपरा:
    बच्चे, युवक और महिलाएं मिलकर घर-घर जाकर छेर छेरा गाते हैं:
    “छेर छेरा! कोठी के धान ल हेर हेरा!”
    इसका अर्थ होता है, “अपनी कोठी का धान निकालो और दान करो।”
  2. दान की प्रथा:
    लोग नए धान, चावल, पैसे या अन्य खाद्य सामग्री दान करते हैं। यह दान जरूरतमंदों और सामूहिक आयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है।
  3. लोक नृत्य और गीत:
    त्योहार के दौरान पारंपरिक नृत्य और गीतों का आयोजन होता है, जिसमें ग्रामीण लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह सामूहिक आनंद और लोक कला को बढ़ावा देता है।

सामाजिक संदेश:
छेर छेरा हमें समाज में सहयोग और समर्पण का संदेश देता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि समाज के हर वर्ग को खुशहाल बनाने के लिए परस्पर सहयोग अनिवार्य है। यह न केवल आर्थिक सहायता का माध्यम है, बल्कि सामूहिक विकास की अवधारणा का प्रतीक है।


निष्कर्ष:
छेर छेरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। यह त्योहार बताता है कि प्रकृति से प्राप्त हर संसाधन का आदान-प्रदान और साझा करना मानवता का मूल आधार है। छत्तीसगढ़ के इस अनूठे त्योहार को केवल एक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक उत्थान और लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार के रूप में देखना चाहिए।

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