जिला सक्ती-छत्तीसगढ़
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पत्रकार योम प्रकाश लहरे ने विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं दिया।

साथियों! आज विश्व आदिवासी दिवस है। भारत सहित दुनिया भर के देशों में आज 9 अगस्त के दिन को हर साल यह दिवस जनजातीय समाज के लोगों द्वारा आदिवासी समाज की परंपराओं उसकी मान्यताओं एवं मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखने की दिशा में जागरूकता फैलाने के निमित्त मनाया जाता है। बात जनजातीय समाज के दशा की भारतीय संदर्भ में करें तो यह जनजातीय समाज भारतवर्ष की मूलनिवासी समाज है जिनका इस देश में इतिहास बहुत ही समृद्ध व गौरवशाली रहा है। यह कहना गलत ना होगा कि वर्तमान भारत के निर्माण में भारतीय जनजातीय समाज ने भी बहुमूल्य योगदान दिया है। आज जरूरत इस बात की भी है कि देश में जनजातीय समाज की समृद्ध व गौरवशाली इतिहास की जानकारी आज की युवा पीढ़ी सहित कल के भविष्य कहे जाने वाले बच्चों को हो। इसके लिए जगह-जगह समाज में मूल निवासी समाज में जन्मे महापुरुषों की जीवनी, उनके जीवन संघर्ष पर प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम, फोटो प्रदर्शनी, पेंटिंग, नाटक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति जैसे जागरूकता कार्यक्रमों की निरंतर आयोजन होते रहने की भी आवश्यकता है । प्रकृति के साथ जीवन जीने वाला यह समाज अपनी सरलता, सहजता व सत्य निष्ठा के लिए जाना जाता है। वहीं दूसरी तरफ यह भी सच है कि हमारे देश में जनजाति समाज सदियों से उपेक्षा व उत्पीड़न का शिकार रहा है। इस मेहनतकश समाज को हमेशा ही प्रताड़ना व उपेक्षा का दंश भी चलना पड़ा है। देश की आजादी में भी आदिवासी समाज का योगदान बुलाया नहीं जा सकता है। यह समाज आजादी की लड़ाई में देश में क्रांति का बिगुल फूंककर अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वाधीनता आंदोलन के मैदान में निर्भीकता से डटा रहा। परलकोट विद्रोह, सिद्धो-कान्हो, भूम काल, पामगढ़ भील क्रांति जैसे उदाहरण जनजातीय समाज का सीना फक्र से ऊंचा करता है। इस समाज में जन्मे शहीद वीर नारायण सिंह, शहीद गुंडाधर एवं गेंद सिंह जैसे क्रांतिकारियों का स्वाधीनता आंदोलन में बलिदान स्वाधीनता आंदोलन में इस समाज की योगदान को प्रमाणित करता है।
आजादी के बाद देश में लागू हुए समता मूलक भारतीय समाज की परिकल्पना वाली भारतीय संविधान भी देश में जनजातीय समाज को राजनीतिक व सामाजिक रूप से सशक्त बनाता है। भारतीय संविधान में इस हेतु अनेक प्रावधान किए गए हैं जिनमें शिक्षा- रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण का प्रावधान शामिल है। अनुच्छेद 15 ( 4) और 46 ये अनुच्छेद अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने की बात करते हैं। इसी प्रकार अनुच्छेद 244 (1) और पांचवी अनुसूची जो कि अनुसूचित जनजातियों की पारंपरिक शासन व्यवस्था और संस्कृति की रक्षा करता है। जबकि छठवीं अनुसूची यह विशेष तौर पर पूर्वोत्तर भारत के कुछ आदिवासी बहुल क्षेत्र में स्वायत्तशासी जिलों और क्षेत्रों के प्रशासन के लिए प्रावधान करती है। अनुच्छेद 275 (1) यह केंद्र सरकार को जनजातीय कल्याण और अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासन के स्तर को बढ़ाने के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का अधिकार देता है। वही अनुच्छेद 330 व 332 यह क्रमश: लोकसभा, राज्यसभा व राज्यों के विधानसभाओं में जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करते हैं। अनुच्छेद 243 (D) यह पंचायतों में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है। इसी क्रम में अनुच्छेद 23 व 24 बंधवा मजदूरी व बाल श्रम को प्रतिबंधित करते हैं।
इन संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का उद्देश्य आदिवासियों को सशक्त बनाना तथा उनकी सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार करने के साथ उनकी संस्कृति और पहचान की रक्षा करना है। देश में समता मूलक भारतीय संविधान के लागू होने के बाद संविधान में उल्लेखित इन प्रावधानों के प्रभावशील होने का प्रतिफल है कि आज राजनीति व प्रशासन में इस समाज के लोग सर्वोच्च पदों पर विराजमान होकर देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। यह दिन भारत की विरासत को संरक्षित करने के साथ -साथ इसे आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।
विश्व आदिवासी दिवस समाज में लोगों के बीच आपसी सद्भाव बढ़ाने के साथ-साथ अपनी संस्कृति पर हमें गर्व करना सीखाता है।






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